शहडोल/ जयसिंहनगर :जमीन सूखी, फाइलें गीली! , भुगतान की धारा , कागजों में तालाब, फाइलों में उठाती भ्रष्टाचार की लहरें! खुलेगा राज या फिर फाइल ही करेगी तैराकी ?
तालाब घोटाला भाग 5
जमीन सूखी, फाइलें गीली! , भुगतान की धारा ,
कागजों में तालाब, फाइलों में उठाती भ्रष्टाचार की लहरें! खुलेगा राज या फिर फाइल ही करेगी तैराकी ?
शहडोल। ग्राम पंचायत बलौड़ी पश्चिम का कथित लघु तालाब मामला अब ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां तालाब जमीन पर कितना है और कागजों में कितना—यह सवाल खुद फाइलें पूछती नजर आ रही हैं। मामला सामने आने के बाद अब जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने संबंधित दस्तावेज मांगे हैं और पूरे प्रकरण का सत्यापन करवाने की बात कही है। लेकिन मामले को पूरा एक सप्ताह बीत गया लेकिन जिला पंचायत सीईओ की तरफ से अब तक कोई भी कार्यवाही नहीं की गई। यानी अब असली परीक्षा उस तालाब की नहीं, बल्कि उन दस्तावेजों की है जिनमें तालाब का अस्तित्व दर्ज है। या फिर यह मान लिया जाए की जिला पंचायत और जनपद पंचायत में भ्रष्टाचार की चमक इतनी पहनी है कि इसके आगे सही और गलत का अंदाजा लगा पाना इन अधिकारियों के लिए मुश्किल है।
तालाब बना या सिर्फ कागजों ने पानी पिया?
मामले में सवाल उठ रहे हैं कि यदि लघु तालाब निर्माण की स्वीकृति हुई, राशि निकली और कार्य पूर्ण बताया गया, तो मौके पर उसकी तस्वीर क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी कागजों में तालाब लबालब भरा हो और जमीन पर ग्रामीण उसे ढूंढते रह जाएं?
कागजों में तालाब इतना मजबूत हो सकता है कि उसमें मछली पालन भी शुरू हो जाए, लेकिन मौके पर ग्रामीणों को सिर्फ जमीन ही दिखाई दे!। तो वही मामले से सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की गढ़ इतनी तेज हो गई है कि जिसमें उपयंत्री हीरामणि मरावी और ग्राम पंचायत के तत्कालीन सचिव ओम प्रकाश और रोजगार सहायक कमलेश ने मिलकर निश्चित ही तत्कालीन मनरेगा अधिकारी के सांठ गांठ से इस पूरे खेल को अंजाम दिया है। जिस पर जांच की बजाय फाइलों को तैराकी के लिए कहीं ना कहीं जिले और जनपद के अधिकारी तैयार हैं।
फाइल भी जांच की कसौटी पर
मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि तत्कालीन पंचायत सचिव ओम प्रकाश द्विवेदी के कार्यकाल के दौरान उनकी पत्नी मीना द्विवेदी के नाम से लघु तालाब निर्माण कार्य स्वीकृत कराया गया। यदि दस्तावेजों में यह तथ्य प्रमाणित होता है तो यह भी जांच का विषय होगा कि संबंधित योजना के नियमों के तहत पूरी प्रक्रिया किस प्रकार संपन्न हुई।
अब फाइलों से यह सवाल भी पूछा जा सकता है—सरकारी योजना थी, हितग्राही कौन था और प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?
पहले जांच हुई, फिर फाइल सो गई?
सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि यदि इस मामले में पहले भी जांच हुई थी तो उसका परिणाम क्या निकला? जांच के बाद कार्रवाई क्यों आगे नहीं बढ़ी? क्या रिपोर्ट ने कोई ऐसा रास्ता पकड़ लिया था, जिसका नक्शा सिर्फ फाइलों को ही मालूम है?
अब नई जांच की बात सामने आने से उम्मीद है कि पुरानी फाइलों की धूल भी झड़ेगी और यह पता चलेगा कि आखिर मामला किस मोड़ पर जाकर रुक गया था।
फिलहाल है पूरा मामला किसी बदबूदार नालें की तरह है जिसमें उपयंत्री सचिव और रोजगार सहायक ने गोते लगाए।
जिसे वर्तमान के जनपद के अधिकारी या तो बेखबर है या फिर उनकी ईमानदारी भी इस बदबूदार नालें की दुर्गंध से अछूती नहीं रह गई है यह कहना अति संयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि लगातार खबर प्रशासन के बाद भी जिम्मेदारों द्वारा अब तक कोई भी ठोस कम नहीं उठाया गया है जो की पूर्णता भ्रष्टाचार को बढ़ावा और संरक्षण देने की ओर इशारा करता नजर आ रहा है।
