शहडोल : शासन ने कहा ‘दैनिक वेतन नियुक्ति नहीं’, बकहो में फिर भी 53 नियुक्तियां! , 89 दिन की स्वीकृति बनी नियमों की ढाल?, भोपाल का आदेश बकहो पहुंचते-पहुंचते बेअसर ?
शासन ने कहा ‘दैनिक वेतन नियुक्ति नहीं’, बकहो में फिर भी 53 नियुक्तियां! ,
89 दिन की स्वीकृति बनी नियमों की ढाल?,
भोपाल का आदेश बकहो पहुंचते-पहुंचते बेअसर ?
शहडोल / बक्हो। शासन के आदेश अगर कागजों तक सीमित रह जाएं तो नियमों का पालन कौन करेगा और जवाबदेही किसकी होगी? शहडोल जिले की नगर परिषद बकहो में दैनिक वेतन/मस्टर रोल पर बड़ी संख्या में कर्मचारियों की नियुक्ति का मामला इसी सवाल को सामने ला रहा है।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि मध्यप्रदेश शासन के वित्त विभाग द्वारा 28 मार्च 2000 को जारी परिपत्र में दैनिक वेतन पर नियुक्ति नहीं करने के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि निर्देश नगरीय निकायों पर भी लागू होंगे।
इसके बावजूद बकहो नगर परिषद में लगभग 53 कर्मचारियों को मस्टर रोल/दैनिक वेतन पर रखे जाने का दावा सामने आया है। वहीं लगभग 60 आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्तियों की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है।
अब सवाल सिर्फ नियुक्तियों का नहीं है—सवाल यह है कि यदि शासन ने दैनिक वेतन नियुक्तियों पर प्रतिबंध लगाया था तो नगर परिषद बकहो में इतनी बड़ी संख्या में नियुक्तियां किस स्वीकृति और किस नियम के तहत की गईं?
28 मार्च 2000 का आदेश—नगरीय निकायों पर भी लागू
मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मध्यप्रदेश शासन, वित्त विभाग का परिपत्र क्रमांक 656/527/2000/सी/चार, दिनांक 28.03.2000 है।
इसमें दैनिक वेतन पर नियुक्ति नहीं करने संबंधी शासन के निर्देशों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया गया कि यह आदेश सार्वजनिक उपक्रमों, निगमों, मंडलों, नगरीय निकायों, विकास प्राधिकरणों तथा सहकारी संस्थाओं पर भी लागू होगा।
आदेश में यह भी कहा गया है कि यदि शासन के निर्देशों के विपरीत नियुक्तियां की गई हों तो संबंधित नियुक्तियों की समीक्षा कर कार्रवाई की जाए और नियमों के विपरीत किए गए भुगतान की वसूली के संबंध में भी कार्रवाई हो।
यानी सवाल यह नहीं कि नियम था या नहीं—सवाल यह है कि नियम था तो बकहो में उसका पालन हुआ या नहीं?
8 अक्टूबर 2025 का पत्र भी दे रहा है संकेत
मामले को और गंभीर बनाता है नगरीय विकास एवं आवास विभाग का पत्र क्रमांक 3768/3833019/2025/18-1, दिनांक 08.10.2025।
इस पत्र में 28 मार्च 2000 के वित्त विभागीय परिपत्र का हवाला देते हुए नगरीय निकायों में दैनिक वेतन पर की गई नियुक्तियों का विवरण मांगा गया।
पत्र में संबंधित निकायों से ऐसे कर्मचारियों के नाम, नियुक्ति दिनांक, वर्तमान पारिश्रमिक तथा तत्कालीन आयुक्त/मुख्य नगरपालिका अधिकारी का नाम सहित जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया।
यानी शासन स्तर पर इस विषय को लेकर स्थिति स्पष्ट है।
अब बड़ा सवाल यह है कि बकहो नगर परिषद में 53 मस्टर रोल कर्मचारियों की नियुक्ति के समय शासन के इन निर्देशों को किस स्तर पर देखा गया और किस अधिकारी की स्वीकृति से यह प्रक्रिया आगे बढ़ी?
‘ 89 दिन’ की स्वीकृति—क्या प्रतिबंध का रास्ता निकालने का माध्यम?
सूत्रों के अनुसार नगर परिषद बकहो में संबंधित कर्मचारियों के लिए 89 दिनों की स्वीकृति लिए जाने की बात सामने आ रही है।
यहीं से मामले का सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—क्या 89 दिनों की अवधि की स्वीकृति देकर शासन के उस व्यापक प्रतिबंध से बचा जा सकता है जिसमें दैनिक वेतन पर नियुक्तियों को लेकर स्पष्ट निर्देश जारी किए जा चुके हैं?
यदि ऐसी कोई स्वीकृति दी गई है तो उसकी वैधानिकता, सक्षम अधिकारी की शक्ति तथा शासन के मूल प्रतिबंध से उसकी संगति की जांच जरूरी है।
यानी ‘89 दिन’ नियमों का विकल्प है या नियमों के पालन से बचने का रास्ता—इसका जवाब जांच से ही सामने आना चाहिए।
53 नियुक्तियां और शासन की जवाबदेही का सवाल
बकहो नगर परिषद में जिन कर्मचारियों को मस्टर रोल/दैनिक वेतन पर रखे जाने की बात सामने आ रही है, उनमें कोमल सिंह, शुभम पांडे, धीरज मिश्रा, लोकेश चौरसिया, दिलीप सिंह सागर, नपित, राज केवट, इंद्रपाल चर्मकार, सत्येंद्र मुंगेरिया, अजीत द्विवेदी, राहुल रजक, सुनील शुक्ला, रीता माझी, इंदु केवट, किरण सहित अन्य नाम बताए जा रहे हैं।
हालांकि इन सभी नियुक्तियों की वास्तविक स्थिति, नियुक्ति आदेश, नियुक्ति की तारीख, पद, भुगतान और सक्षम स्वीकृति की पुष्टि मूल अभिलेखों की जांच से होना आवश्यक है।
एक बिना डिग्री इलेक्ट्रीशियन की नियुक्ति का भी दावा
मामले में सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि पुष्पेंद्र साहू नामक व्यक्ति को इलेक्ट्रीशियन के रूप में रखा गया, जबकि उसके पास आवश्यक तकनीकी योग्यता/डिग्री नहीं होने की बात कही जा रही है।
यदि यह तथ्य सही है तो नगर परिषद में तकनीकी कार्य के लिए नियुक्ति प्रक्रिया और पात्रता की भी अलग से जांच की आवश्यकता होगी।
हर महीने 8 से 10 लाख—भुगतान का हिसाब कौन देगा?
मामले का आर्थिक पक्ष भी कम गंभीर नहीं है।
जानकारों के अनुसार मस्टर रोल/दैनिक वेतन पर रखे गए कर्मचारियों के वेतन अथवा मानदेय के नाम पर नगर परिषद निधि से प्रतिमाह लगभग 8 से 10 लाख रुपये तक भुगतान होने का दावा किया जा रहा है।
यदि दस्तावेजों की जांच में यह भुगतान शासन के प्रतिबंधों के विपरीत की गई नियुक्तियों से संबंधित पाया जाता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि:
इन भुगतानों की स्वीकृति किसने दी?
मस्टर किसने प्रमाणित किया?
भुगतान आदेश किस अधिकारी ने जारी किए?
और यदि नियुक्तियां नियम विरुद्ध थीं तो शासकीय राशि की जिम्मेदारी किस अधिकारी की तय होगी?
यही वह बिंदु है जहां मामला केवल नियुक्तियों से निकलकर शासकीय धन के भुगतान और जवाबदेही तक पहुंच जाता है।



