S.K. Paswan
ब्रेकिंग न्यूज़
शहडोल : बार-बार सड़कों पर छात्र, अफसरशाही और कागजी खुराफात, बजट के खजाने पर लूट की बरसात??? ! , ... शहडोल : राजघाट पर सत्याग्रह देश के सियासतदानों पर मंडराता कुर्सी का भय , राहुल के बयान से सियासी... शहडोल : स्वर्गीय राजाराम अवस्थी  की द्वितीय पुण्यतिथि पर होगा भंडारे का आयोजन शहडोल: कुंभकर्णी निद्रा या गांधी जी की मुद्रा???? से मौन हुए जिम्मेदार , खबर के बाद प्रशासन के हरकत... शहडोल : शासन ने कहा ‘दैनिक वेतन नियुक्ति नहीं’, बकहो में फिर भी 53 नियुक्तियां! , 89 दिन की स्वीकृत... शहडोल : सेवा सेतु अभियान के तहत हितग्राहियों को मिला योजना का लाभ शहडोल : शिकायतों का फर्जी निराकरण कर खुद की पीठ थपथपा रहा पीडब्ल्यूडी, देव कंस्ट्रक्शन ने करोड़ों के... शहडोल : जिला काँग्रेस कमेटी ने मनाई राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्... शहडोल :पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत पार्षद सिल्लू रजक ने माया रजक को प्रदान की वाशिंग मशीन, आत्मनिर्... शहडोल : अपरसत्र न्यायाधीश ने कहा सत्य का मार्ग अटल होना चाहिए , गांधी जयंती के अवसर पर विभिन्न कार्...

शहडोल : बार-बार सड़कों पर छात्र, अफसरशाही और कागजी खुराफात, बजट के खजाने पर लूट की बरसात??? ! ,  जवाब-सवाल, नोटिस और जांच के कागजी खेलों पर टिका शिक्षा विभाग का भ्रष्टाचार! अव्यवस्थाओं पर सुधार क्यों नहीं???

0 127

बार-बार सड़कों पर छात्र, अफसरशाही और कागजी खुराफात, बजट के खजाने पर लूट की बरसात??? ! ,

 जवाब-सवाल, नोटिस और जांच के कागजी खेलों पर टिका शिक्षा विभाग का भ्रष्टाचार! अव्यवस्थाओं पर सुधार क्यों नहीं???

शहडोल। जिले की विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाओं में जिस तरह एक के बाद एक अव्यवस्थाओं के मामले सामने आ रहे हैं, उन्हें सामान्य घटनाक्रम मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जैतपुर स्थित एकलव्य विद्यालय का मामला अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि गोहपारू विकासखंड के कन्या शिक्षा परिसर की अव्यवस्थाओं को लेकर छात्राओं के सड़क पर उतरने का मामला सामने आ गया। बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर छात्राओं का धरना देना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

सवाल यह है कि जिन विशिष्ट संस्थाओं के संचालन और व्यवस्थाओं के लिए शासन करोड़ों रुपये का बजट आवंटित करता है, वहां आखिर ऐसी कौन-सी कमियां हैं, जिनके कारण छात्र-छात्राओं को बार-बार अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है? क्या बजट आवंटन के अनुरूप सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं? क्या संस्थाओं की नियमित निगरानी हो रही है? और यदि निरीक्षण हो रहे हैं, तो फिर जमीनी स्तर पर अव्यवस्थाएं सामने क्यों आ रही हैं?

 गोहपारू कन्या शिक्षा परिसर में आया राम, गया राम की कहानी!

गोहपारू कन्या शिक्षा परिसर की व्यवस्थाओं को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। अपुष्ट सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस संस्थान में पूर्व में प्रभारी प्राचार्य के रूप में पदस्थ रहे नीरज गुप्ता लगभग दो माह पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सूत्रों के हवाले से उनके कार्यकाल के दौरान बजट के उपयोग और छात्राओं को उपलब्ध कराई जाने वाली बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और बजट के वास्तविक उपयोग की जानकारी उपलब्ध होना आवश्यक है। ऐसे में संबंधित कार्यकाल के दौरान हुए व्यय, उपलब्ध कराई गई सुविधाओं और संस्थान के रखरखाव से जुड़े अभिलेखों की जांच की जरूरत महसूस होती है।

यह तो बीते कार्यकाल की बात है, लेकिन अब सवाल वर्तमान व्यवस्था पर भी खड़े हो रहे हैं।

वर्तमान में संस्थान का प्रभार विकासखंड शिक्षा अधिकारी, गोहपारू के पास होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, यह प्रभार केवल शैक्षणिक कार्यों तक सीमित है अथवा इसमें वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार भी शामिल हैं, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

ऐसे में विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि संस्थान की वर्तमान व्यवस्था में वित्तीय निर्णय लेने, बजट खर्च करने, छात्रावास की सुविधाओं की निगरानी करने और जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास है।

 करोड़ों के बजट से लैस विशिष्ट संस्थाओं की व्यवस्थाएं बदहाल!

जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत संचालित विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाओं और छात्रावासों के संचालन, रखरखाव तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए शासन द्वारा बजट उपलब्ध कराया जाता है। इसके बावजूद आदिवासी अंचल की इन संस्थाओं में बुनियादी सुविधाओं को लेकर बार-बार विवाद और विरोध की स्थिति सामने आना विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

बीते दो माह के दौरान जिले की विशिष्ट संस्थाओं में सुविधाओं के अभाव को लेकर सामने आई घटनाओं ने व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। यदि वास्तव में लगातार पांचवीं बार छात्र-छात्राओं को अपनी मांगों के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा है, तो यह केवल किसी एक संस्थान की समस्या नहीं, बल्कि निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था की समीक्षा का विषय है।

आखिर करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद छात्र-छात्राओं को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? क्या बजट का उपयोग प्राथमिकता के आधार पर किया जा रहा है? क्या संस्थानों की जरूरतों का वास्तविक आकलन होता है? और क्या आवंटित राशि के खर्च के बाद सुविधाओं की गुणवत्ता का सत्यापन किया जाता है?

इन सवालों का जवाब केवल विभागीय स्पष्टीकरण से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों और जमीनी जांच से ही सामने आ सकता है।

 विभाग का अपना मद, फिर भी किराए के भवन में परिसर का संचालन!

प्राप्त जानकारी के अनुसार, गोहपारू कन्या शिक्षा परिसर का संचालन किराए के भवन में किया जा रहा है। यदि यह जानकारी सही है, तो यह भी जांच और स्पष्टीकरण का विषय है कि संस्थान के लिए स्थायी भवन की व्यवस्था अब तक क्यों नहीं हो सकी।

जब शासन द्वारा संस्थानों के संचालन और आवश्यक सुविधाओं के लिए बजट उपलब्ध कराया जाता है, तब स्थायी भवन की आवश्यकता, भूमि की उपलब्धता, निर्माण की स्वीकृति और बजट की व्यवस्था को लेकर विभाग की क्या योजना है?

जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत संचालित संस्थाओं के लिए भवन निर्माण और रखरखाव की व्यवस्थाओं को लेकर भी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए। यदि संबंधित मदों में भवन निर्माण का प्रावधान उपलब्ध है, तो अब तक इस दिशा में क्या कार्रवाई की गई है, इसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

यह वही विभाग है, जिसके अंतर्गत विभिन्न संस्थानों में मरम्मत और रखरखाव के कार्य कराए जाते हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिन संस्थानों के संचालन पर लगातार बजट खर्च किया जा रहा है, उनकी स्थायी अधोसंरचना और बुनियादी सुविधाओं की समस्या का समाधान कब होगा?

 कमियों में सुधार के बजाय कागजी खुराफात! 

विभाग के आला अधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जब लगातार संस्थानों में अव्यवस्थाओं की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो उनके स्थायी समाधान के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

जनसंपर्क के माध्यम से सामने आई जानकारी के अनुसार, संबंधित मामले में स्पष्टीकरण और कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की बात कही गई है। संभागीय स्तर के संबंधित अधिकारी जेपी यादव द्वारा कार्रवाई किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, नोटिस जारी होने, जवाब प्राप्त होने और आगे की कार्रवाई की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना अभी आवश्यक है।

यहां सवाल यह नहीं है कि नोटिस जारी किया गया या नहीं, बल्कि यह है कि नोटिस के बाद व्यवस्था में क्या बदलाव आया?

यदि किसी संस्थान में छात्राओं को बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण विरोध करना पड़ रहा है, तो सबसे पहले उनकी समस्याओं का समाधान होना चाहिए। इसके बाद यह तय किया जाना चाहिए कि जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है और लापरवाही के लिए कौन जवाबदेह है।

जानकारी के अनुसार, छात्राएं सुबह लगभग चार बजे छात्रावास से बाहर आई थीं और बाद में सुबह करीब 7:30 बजे सहायक आयुक्त तथा संभागीय स्तर के अधिकारी द्वारा उनकी काउंसलिंग की गई। ऐसे में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस दौरान छात्राओं ने किन समस्याओं को प्रमुखता से उठाया, अधिकारियों ने क्या आश्वासन दिया और उन समस्याओं के समाधान के लिए कौन-सी समय-सीमा निर्धारित की गई।

आखिर बार-बार छात्राओं को अपनी बात मनवाने के लिए सड़क पर क्यों आना पड़ रहा है? क्या उनकी शिकायतों का समय रहते समाधान नहीं हो सकता? और क्या विभाग के पास ऐसी कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है, जिसके माध्यम से छात्र-छात्राएं बिना आंदोलन किए अपनी समस्याओं का निराकरण करा सकें?

 

 माह-दो माह में निरीक्षण, फिर भी जमीनी हकीकत से गुरेज क्यों?

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले और संभागीय स्तर के अधिकारी समय-समय पर विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाओं एवं छात्रावासों का निरीक्षण करते हैं। यदि नियमित निरीक्षण की व्यवस्था लागू है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि छात्र-छात्राओं को बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सामना क्यों करना पड़ रहा है।

निरीक्षण का उद्देश्य केवल संस्थान का दौरा करना या औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि वहां की वास्तविक स्थिति का आकलन करना, छात्र-छात्राओं से संवाद करना, भोजन, पेयजल, स्वच्छता, आवासीय सुविधाओं और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं की जांच करना भी है।

यदि निरीक्षण के दौरान कमियां सामने आती हैं, तो उनके निराकरण के लिए समय-सीमा निर्धारित करना और अनुपालन की समीक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।

ऐसे में विभाग को यह बताना चाहिए कि पिछले दो माह के दौरान संबंधित संस्थानों का कितनी बार निरीक्षण किया गया, निरीक्षण प्रतिवेदनों में कौन-कौन सी कमियां दर्ज की गईं और उनके समाधान के लिए क्या कार्रवाई हुई।

यदि निरीक्षण के बावजूद समस्याएं बनी हुई हैं, तो फिर निरीक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना लाजिमी है।

अधिकारियों के दौरों, निरीक्षण और अन्य व्यवस्थाओं पर होने वाले सरकारी खर्च का उद्देश्य संस्थानों की स्थिति में सुधार लाना है। इसलिए जरूरी है कि इन दौरों का परिणाम भी धरातल पर दिखाई दे। आखिर छात्र-छात्राओं को सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े और अधिकारी निरीक्षण करते रहें, तो ऐसी व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?

 

 सिर्फ कागजों में होगी कोरमपूर्ति या धरातल पर भी दिखेगा सुधार?

विभागीय स्तर पर सवाल-जवाब, स्पष्टीकरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई के आश्वासन अपनी जगह हैं, लेकिन वास्तविक कसौटी संस्थानों की व्यवस्था में होने वाला सुधार है।

यदि बीते दो माह के दौरान यह पांचवीं घटना है, जैसा कि सामने आई जानकारी में दावा किया जा रहा है, तो विभाग को इस पूरे घटनाक्रम की समग्र समीक्षा करनी चाहिए। इससे पहले कन्या शिक्षा परिसर कंचनपुर और एकलव्य विद्यालय जैतपुर जैसे संस्थानों से संबंधित मामलों में भी विरोध और अव्यवस्थाओं की शिकायतें सामने आने की बात कही गई है। इन मामलों में हुई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होना भी आवश्यक है।

सवाल यह है कि क्या पूर्व में सामने आई शिकायतों के बाद स्थायी सुधार किए गए? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाबदेही तय की गई? क्या छात्र-छात्राओं की समस्याओं का निराकरण हुआ? और क्या उन संस्थानों की दोबारा जांच की गई, जहां पहले भी अव्यवस्थाओं की शिकायतें सामने आई थीं?

यदि हर बार शिकायत के बाद नोटिस जारी कर फाइल बंद कर दी जाती है, तो व्यवस्था में सुधार कैसे होगा? वहीं, यदि जांच के आधार पर कमियां दूर की जाती हैं, जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होती है और सुविधाओं की नियमित निगरानी की जाती है, तभी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।

 

जनता का सवाल सीधा है—बजट आवंटन, निरीक्षण, नोटिस और जांच की लंबी प्रक्रिया के बावजूद यदि छात्र-छात्राओं को बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, तो आखिर जवाबदेही किसकी है?

 

अब देखना यह है कि विभागीय कार्रवाई केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है या गोहपारू कन्या शिक्षा परिसर सहित अन्य संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए धरातल पर भी ठोस कदम उठाए जाते हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.