जैतपुर :क्या आश्वासन देकर उम्मीदो पर खड़ा उतरेगा स्थानीय प्रशासन,???? मूलभूत सुविधाओं को लेकर प्रशासन व सरकार के खिलाफ जैतपुर के मतदाताओं ने खोला था मोर्चा
क्या आश्वासन देकर उम्मीदो पर खड़ा उतरेगा स्थानीय प्रशासन,????
मूलभूत सुविधाओं को लेकर प्रशासन व सरकार के खिलाफ जैतपुर के मतदाताओं ने खोला था मोर्चा
शहडोल (संजय गर्ग) । लोकतंत्र के महापर्व पर 19 अप्रैल को लोकसभा चुनाव का प्रथम चरण आरंभ हुआ जिस पर शहडोल जिले के जैतपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदान क्रमांक केंद्र 77 खामहीडोल , 184 ,185, रामपुर बटुरा , 181 पड़रिया के मतदाताओं द्वारा गांव में लाइट पानी रोड जैसी मूलभूत सुविधाओं की समस्याओं को लेकर सरकार व स्थानीय प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। जिसके विरोध में ग्रामीण मतदाताओं द्वारा मतदान का बहिष्कार किया ।
मतदाताओं का कहना था कि लगातार मूलभूत सुविधाओं के लिए हम अपनी आवाज को प्रशासन तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे किंतु आज दिनांक तक हमारी समस्याओं को निराकार नहीं हुआ उन्होंने बताया कि कोल माइंस से पुनर्वास की समस्या रामपुर बटवा में है एवं पड़रिया में पानी की समस्या वह थाने में परिसीमन से संबंधित समस्याओं का निराकरण आज दिनांक तक नहीं किया गया इसके विरोध में हम मतदान का बहिष्कार करते हैं।
गौर करने वाली बात तो यह है कि लोकतंत्र के महापर्व पर जहां इतने वर्षों से ग्रामीणों की समस्याओं का हल नहीं हुआ तो उन्होंने लोकसभा चुनाव के निर्धारित तिथि को ही अपना हथियार बनाया जो की एक तरीके से सही भी था क्योंकि इस तरह उन्हें लगा कि यही एकमात्र साधन है जिससे वह अपनी बात स्थानीय प्रशासन को बता सकते हैं। बाकी वैसे तो अधिकारियों के पास इतना समय नहीं है की चौपाल बनाकर ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी समस्या सुनी जाए शायद इसीलिए यह स्थिति बनी कि ग्रामीणों को मतदान का बहिष्कार करना पड़ा अगर यही कार्य या उनकी समस्याओं को निराकरण मतदान के पहले हो जाता तो ऐसी नौबत नहीं आती। किंतु शायद अधिकारी व जनप्रतिनिधि इस बात को समझते हैं की आदिवासी बहुल आंचल है जैसा समझा दोगे वैसा समझ जाएंगे। किंतु मतदान के चलते ही सही प्रशासन का चौपाल देखकर कुछ पल के लिए राहत की किरण दिखाई दी अब यह किरण कब तक ऐसे दिखती रहेगी या देखने वाली बात होगी। आश्वासन देकर मतदान तो कर लिया गया किंतु मूलभूत सुविधाओं का निराकरण व ग्रामीणों की समुचित व्यवस्थाओं का जिम्मा क्या प्रशासन पूरी तरीके से लेगा। यह तो भविष्य के गर्भ में ही छुपा है।
किंतु इतना जरूर कह सकते हैं की जनता कुछ हद तक ही सही पर अपने अधिकारों के लिए आज भी जागरुक है।
