शहडोल : भारत का 77वां गणतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संभावना या फिर सांप्रदायिकता की आग में झुलस्ता गुलिस्तां हमारा
भारत का 77वां गणतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संभावना या फिर सांप्रदायिकता की आग में झुलस्ता गुलिस्तां हमारा
शहडोल (संजय गर्ग) । भारतीय गणतंत्र का 77 व पावन पर्व जिसकी नींव संविधान निर्माता के नाम से विश्व में प्रसिद्ध प्राप्त डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने रखी जिसे 1949 में अपनाते हुए 1950 26 जनवरी को लागू किया गया।
गणतंत्र अर्थात लोक शासन जिससे विश्व पटल पर भारत की अलग छाप बनी ।
भारतीय संविधान 22 भागों में विभाजित तथा 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियों से सुसज्जित है।
समाज में हर वर्ग के लोगों को सामान्यतः मिले सभी के अधिकार उन्हें प्राप्त हो हर वर्ग का व्यक्ति इस देश में सर उठा कर चल सके इसी सोच से बाबा साहब ने संविधान बनाया।
इसी संविधान के तहत भारत के प्रत्येक नागरिक को मिले उसके संवैधानिक अधिकार जैसे –
समानता का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22):
भाषण और अभिव्यक्ति, सभा, संगठन, आवागमन, निवास और व्यवसाय की स्वतंत्रता, अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण, और शिक्षा का अधिकार।
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24): मानव तस्करी, बेगार (जबरन मजदूरी) का निषेध, और कारखानों में बच्चों के नियोजन पर प्रतिबंध।
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25-28)
धर्म को मानने, आचरण करने, प्रचार करने की स्वतंत्रता, और धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता।
सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30):*
अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण, और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार।
संवैधानिक उपचारों का अधिकार ( अनुच्छेद 32):
मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार, जिसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने “संविधान की आत्मा” कहा है।
लेकिन सबसे बड़ी विचारणीय पहलू आज के समय में यह है कि जिस संविधान के तहत भारत में लोक शासन और जनतंत्र प्रजातंत्र जैसे शब्दों का समावेश है।
क्या वर्तमान के भारत में यह सभी सुचारू रूप से चल रहे हैं क्या जानता अपने अधिकारों के प्रति जागरुक है।
क्या धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कहलाने वाला भारत क्या सचमुच सर्व धर्म समभाव एवं वसुदेव कुटुंबकम् की अवधारणा को अपना रहा है।
क्योंकि यदि ऐसा है तो प्रयागराज में बीते दिनों जिस प्रकार आदि गुरु शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वराआनंद स्वामी के शिष्यों को जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में बाल पड़कर मरा गया वह कि सनातन संस्कृति के तहत था। और इसमें कौन सा हिंदू राष्ट्र बन रहा है।
वही बनारस में लगातार वहां के प्राचीन कालीन मंदिरों को ध्वस्त किया जा रहा है। वह किस प्रकार हिंदुत्व का शंखनाद विश्व पटल पर करेगा।
जिस देश को 100 साल कि अंग्रेजी गुलामी से आजाद करने के लिए सभी धर्म और समुदाय के क्रांतिकारी एक लक्ष्य भारत की आजादी लेकर अपने अपने स्तर से प्रयास किया। चाहे वह पंडित चंद्रशेखर आजाद हो , या फिर शहीद सरदार भगत सिंह , या फिर काकोरी कांड में प्रमुख क्रांतिकारियों में से अशफाक उल्ला खान ,हो। यह सारे ही क्रांतिकारी अलग धर्म और अलग मजहब से हैं लेकिन इनका लक्ष्य देश की आजादी था। जिसमें इन्होंने मिलकर कार्य किया।
यह एक उदाहरण मात्र है। जिससे यह समझ जा सके कि जिस भारत देश को वर्तमान में जाति धर्म वर्ग समुदाय के नाम पर बांटने की तैयारी की जा रही है वह केवल और केवल धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता वाला देश है। जिसकी अस्तित्व बनाने के लिए डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जैसे बड़े-बड़े लोगो ने अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है।
धर्म कि ताल पर बिछी सत्ता की बिसात
देश का दुर्भाग्य कहे या सौभाग्य जहां पर राजनीति शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार और देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर की जाती थी।
आज वह सिर्फ धर्म मजहब हिंदू – मुस्लिम तक ही सीमित रह गया। जिसका उदाहरण कुछ इस प्रकार है।
ज्ञानवापी मस्जिद (वाराणसी): यहाँ एएसआई सर्वे में मंदिर के प्राचीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है और हिंदू पक्ष द्वारा पूजा करने की अनुमति मांगी गई है।
शाही ईदगाह (मथुरा): कृष्ण जन्मभूमि के पास स्थित इस मस्जिद पर भी मंदिर तोड़कर बनाने का दावा है और मामला न्यायालय में है।
शिक्षा पर राजनीति
अब बात करें शिक्षा की तो बीते दिनों जम्मू-कश्मीर के कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस की एमबीबीएस मान्यता राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने जनवरी 2026 में रद्द कर दी है। मुख्य कारण निरीक्षण के दौरान शिक्षकों, डॉक्टरों और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) में गंभीर कमियां और मानक पूरे न करना बताया गया है, हालांकि यह विवाद स्थानीय हिंदू संगठनों द्वारा कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की अधिकता को लेकर किए गए विरोध के बाद आया।
विवाद बचने के बाद माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति का गठन किया गया जिसमें बजरंग दल आरएसएस 60 संगठन शामिल थे। जिसको लेकर सोशल मीडिया विभिन्न प्लेटफार्म पर तेजी से वीडियो वायरल हो रही है और यह पूरा विषयों में चर्चा चल रहा है।
राजनीतिक और सांप्रदायिक दबाव:
हालांकि जन चर्चा में ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं। कथित मेडिकल कॉलेज में 50 सीटों में से 42 पर मुस्लिम छात्रों का दाखिला होने के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया, जिससे यह मुद्दा सांप्रदायिक हो गया।
स्वास्थ्य सेवाओं का ऐसा हाल भारत कैसे खुशहाल
ज्यादा दूर न जाए तो मध्य प्रदेश के सतना जिले में जिस प्रकार सरकारी अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित पांच नवजात शिशुओं की जान चली गई । वही एनडीटीवी ने अपने एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया है कि ने सतना जिला अस्पताल में 2009 से होल ब्लड से पैकसेल और प्लाज्मा अलग करने का काम हो रहा है. आशंका जताई जा रही है कि जिस प्लेटलेट्स का उपयोग स्थानीय स्तर पर किया गया, कहीं संक्रमण वहीं से तो नहीं फैला. पहले ही खून के काले कारोबार का पर्दाफाश किया था. अगर सरकार ने तब जागकर कार्रवाई की होती, तो शायद आज ये मासूम इस हाल में न होंते। ऐसा एनडीटीवी का कहना है।
ऐसे ही कई उदाहरण है।
जिसमें सबका साथ सबका विकास वाले नारे के केवल कागजों में ही दिख रहे हैं।
सिंगरौली में आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा , राजस्थान की अरावली पर अवैध माइनिंग , और प्रदेश के सबसे बड़े साफ शहर इंदौर में मल मूत्र के पानी पीने से कई लोगों की मौत। और मुआवजे के नाम पर दो-दो लाख रुपए शासन द्वारा दिए गए।
नेता जनता के सेवक होते हैं जनता के अधिकारी नहीं। यहीं पर यह दिखाता है कि गणतंत्र भारत में सुचारू रूप से चल रहा है या नहीं।
देश की राजधानी जहां से पूरा देश संचालित होता है। वहां की हवा में प्रदूषण की मात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है।
तो सवाल सिर्फ इतना है कि देश में सांस लेना पानी -पीना , हक की बात करने वाला विरोधी क्यों हो जाता है।
जिस देश में सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्ष की आवाज को दबाया जाता है संसद में सवाल पूछने पर माइक बंद कर दिया जाता है। तो भारत में गणतंत्र दिवस जो मनाया जा रहा है क्या सचमुच यहां लोक शासन है या फिर एकाअधिकार।
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नोट – यह खबर केवल वर्तमान में देश में चल रही गतिविधियों को लेकर एक समीक्षा है। जो हमने देखा वह लिखा है। किसी भी धर्मजाति को बढ़ावा या नीचे दिखाने का इस खबर का कोई उद्देश्य नहीं है सिर्फ वर्तमान की परिस्थितियों का अवलोकन कर खुद जागने की और जनता को जगाने की इच्छा है।

