S.K. Paswan
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शहडोल : प्राइवेट अस्पतालों के कृपा पर चल रहा धंधा , क्षेत्र का दूषित वायुमंडल, बना हजारों ग्रामीणों के जान पर आफत , जैव चिकित्सा अपशिष्ट विकास के नाम पर मौत का सौदा, टॉक्सिक और केमिकल्स अर्क का हवा में रिसाव घातक बीमारियों को देता न्योता,

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प्राइवेट अस्पतालों के कृपा पर चल रहा धंधा ,
क्षेत्र का दूषित वायुमंडल, बना हजारों ग्रामीणों के जान पर आफत ,

जैव चिकित्सा अपशिष्ट विकास के नाम पर मौत का सौदा,
टॉक्सिक और केमिकल्स अर्क का हवा में रिसाव घातक बीमारियों को देता न्योता,

शहडोल (निशांत संजय गर्ग)। प्राकृतिक और खनिज संपदा से परिपूर्ण शहडोल क्षेत्र पहले के समय में यहां का वातावरण जितना शुद्ध और पवित्र था आज यहां पर सिर्फ प्रदूषण का गढ़ बनकर रह गया । प्रचुर मात्रा में उपलब्ध यहां के प्राकृतिक संपदाओं पर तेजी से उद्योगपतियों का कब्जा जमता जा रहा है।
जो कि यहां के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर क्षेत्र को लोगों को सिर्फ और सिर्फ बीमारी और प्रदूषण के खाई में धकेलना का काम कर रहे हैं।
हालांकि इस विषय पर यदि जाए तो शायद लेखन समाप्त न हो लेकिन मुद्दा काफी गंभीर है। जिस पर चर्चा काफी गहरी है।
इसी प्रकार का मामला जिला मुख्यालय से लगे हुए इटौर जो की कोनी तिराहे से महज लग – भग 10 किलोमीटर की दूरी जिला उमरिया में है।
यहां पर जैव चिकित्सा अपशिष्ट को नष्ट करने का काम किया जाता हैं।

गाइडलाइन की अनदेखी और अनियमितताओं की भरमार पहुंचाते पर्यावरण को नुकसान

बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट मुख्य दिशा निर्देश कि यदि बात करें तो
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार जैक चिकित्सा अपशिष्ट के कचरे को उसके प्रकार के आधार पर रंग-कोडिंग के जरिए अलग करना अनिवार्य है। लेकिन इटौर में संचालित जैव चिकित्सा अवशिष्ट को नष्ट करने वाले इस प्रबंधन ने नियमों को ताक पर रखकर कार्य किया जा रहा है। जो प्रशासन के लिए जांच का विषय है।

अलग रंग के बागों में कचरे का वर्गीकरण जरूरी

पीला बैग : शरीर के अंग, ऊतक खून से सनी पट्टियां, रूई, एक्सपायर्ड दवाइयां। (इनका निपटान भस्मीकरण किया जाना अनिवार्य है। ठीक इसी प्रकार
लाल बैग : प्लास्टिक कचरा जैसे ग्लव्स, बोतलें, ट्यूब, कैथेटर, सिरिंज (सुई रहित)। (इनका निपटान ऑटोक्लेविंग/रीसाइक्लिंग द्वारा होता है)।
सफेद व नीला बैग नुकीली वस्तुएं  जैसे सुई , ब्लेड, टूटी कांच की वस्तुएं। (इनका निपटान स्टरलाइजेशन/श्रेडिंग द्वारा होता है)।

इन सभी प्रकार के कचरो का वर्गीकरण कर इन्हें उच्च तापमान में रखकर नष्ट किया जाना अनिवार्य होता है साथ ही इनके नस्तीकरण के पश्चात इनमें से निकलने वाली हानिकारक गैस जो कि एचआईवी एड्स कैंसर जैसे अन्य घातक बीमारियों को न्योता देते हैं। उनसे भी बचाव करना आवश्यक है।
यदि इस जैव चिकित्सा अवशेषों को नस्तीकरण के पश्चात आसपास के नदियों या जल सूत्रों के इर्द-गिर्द फेंक दिया जाए तो जल प्रदूषण हो सकता है जिसमें इसमें से निकलने वाले जहरीले पदार्थ पानी में घुल जाते हैं।
इतना ही नहीं मृदा प्रदूषण भी इसका एक बहुत बड़ा कारण है। जब इन अवशेषों को एक निश्चित जगह पर डंप कर गड्ढे में डाल के पाठ दिया जाता है तो इससे उसे जगह की मृदा की उपज कमजोर होती है और आसपास के इलाकों की जमीन है बंजर होने की संभावना भी अधिक होती है। जिसका सबसे बड़ा कारण किसानो की खेती पर पड़ता है।

बार कोडिंग और भंडारण व कर्मचारियों का प्रशिक्षण जरूरी

जैव चिकित्सा मैनेजमेंट प्रबंधन व उसका उपयोग करने के लिए सभी स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण होना जरूरी है साथ ही अलग-अलग रंग के कचरो के बैग में बार कोडिंग आवश्यक है। वहीं यदि यहां पर जैव चिकित्सा अपशिष्ट के भंडारण की बात की जाए तो 48 घंटे से ज्यादा किसी भी प्रकार के जैव चिकित्सा अपशिष्ट को रखना कानूनी अपराध होता है। और उनका प्राइवेट अस्पतालों से उठाव करने के पूर्व उन्हें डिसइनफेक्ट करना जरूरी है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या संचालित यह जैव चिकित्सा प्लांट क्या इन सभी नियमों का पालन करता है या नहीं।
क्योंकि आज के समय पर नियम निर्देशों पर चलने वाले लोग बहुत कम है।

प्राइवेट अस्पतालों से जुगाड़ पद्धति

वहीं यदि इटौर में संचालित इस सूत्रों की माने तो बायोमेडिकल प्लांट के संचालक की बात की जाए तो इनके द्वारा नगर के प्राइवेट अस्पतालों से जुगाड़ बनाकर इस प्लांट का संचालन किया जा रहा है।
जिनके ऊपर अब उस इलाके के लोगों का यह दावा है कि उनके द्वारा संचालित किया जा रहा है इस बायोमेडिकल प्लांट में जो भी जैव चिकित्सा अवशिष्ट नष्ट किए जाते हैं उसे वहां के लोगों पर वह उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। साथ ही वहां का वायुमंडल एवं जल स्त्रोत दूषित हो रहे हैं। ऐसा सूत्रों का कहना है।
प्रशासन का इस ओर  ध्यान कब

वही बड़ा सवाल यह है कि क्षेत्र के लोगों में यह चर्चा तेजी से चल रही है कि संचालित इस जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्लांट के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है ऐसे में शहडोल के प्रशासन एवं प्रदूषण नियंत्रण कार्यालय में बैठे प्रबंधक क्या कर रहे है।
और खबर प्रकाशन के बाद मामला प्रशासन के संज्ञान में कब तक आता है यह देखना होगा।

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