शहडोल : राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान को किया नमन , विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित
राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान को किया नमन ,
विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित
शहडोल । पंडित शंभूनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल के इतिहास विभाग में अमर बलिदानी राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस के अवसर पर गरिमापूर्ण एवं अकादमिक वातावरण में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में दोनों वीरों के योगदान, संघर्ष, साहित्यिक चेतना और मातृभूमि के प्रति उनके अदम्य समर्पण को स्मरण किया गया।
कार्यक्रम का आयोजन माननीय कुलगुरु प्रो. राम शंकर जी के दिशा-निर्देशन में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. चेतना सिंह ने की। डॉ. नीलेश शर्मा संयोजक तथा डॉ. सुषमा नेताम सह-संयोजक रहीं। कार्यक्रम का संचालन इतिहास विभाग के अतिथि विद्वान श्री आशुतोष तिवारी ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत के पश्चात राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया। उपस्थित शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने दोनों वीरों के साहस, स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति समर्पण को स्मरण करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता की। समीर नापित ने राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह के जीवन, संघर्ष और बलिदान पर सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज के योगदान को समझने और स्थानीय इतिहास के अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
इसके बाद प्रिंस सेन एवं सूरज बैगा ने राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह द्वारा रचित कविताओं का भावपूर्ण पाठ किया। वहीं जोया अंसारी ने पोस्टर निर्माण के माध्यम से दोनों वीरों के जीवन और बलिदान को रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर डॉ. सुषमा नेताम ने कहा कि राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह का जीवन साहस, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। इतिहास का अध्ययन केवल अतीत की घटनाओं को जानने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उससे वर्तमान पीढ़ी को अपने सामाजिक दायित्वों और सांस्कृतिक विरासत को समझने की दृष्टि प्राप्त होनी चाहिए। उन्होंने जनजातीय एवं स्थानीय इतिहास को व्यापक भारतीय इतिहास की धारा में उचित स्थान देने तथा विद्यार्थियों में शोध की प्रवृत्ति विकसित करने पर बल दिया।
डॉ. नीलेश शर्मा ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के व्यापक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह संघर्ष देश के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की व्यापक प्रक्रिया थी। उन्होंने राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह की ऐतिहासिक भूमिका को मध्य भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण बताते हुए विद्यार्थियों से स्थानीय एवं जनजातीय इतिहास के स्रोतों का गंभीरता से अध्ययन करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. चेतना सिंह ने अपने संबोधन में राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह के व्यक्तित्व और कृतित्व को इतिहास, साहित्य एवं प्रतिरोध की चेतना से जोड़ते हुए कहा कि उनका बलिदान स्वाभिमान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरक स्मृति है। उन्होंने कहा कि महान व्यक्तित्वों को केवल स्मृति-दिवस तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है; उनके जीवन और विचारों का आलोचनात्मक एवं स्रोत-आधारित अध्ययन ही उनके प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि है।
प्रो. सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग का दायित्व है कि स्थानीय इतिहास, जनजातीय इतिहास तथा स्वतंत्रता आंदोलन में मध्य भारत की भूमिका को शोध एवं अकादमिक विमर्श के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुंचाया जाए। उन्होंने विद्यार्थियों की भाषण, कविता-पाठ और पोस्टर जैसी रचनात्मक प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे माध्यम इतिहास को विद्यार्थियों के लिए अधिक जीवंत और प्रभावशाली बनाते हैं।
कार्यक्रम के अंत में आशुतोष तिवारी ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय के अकादमिक वातावरण में इतिहास के साथ जीवंत संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह की स्मृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने को सामूहिक शैक्षणिक दायित्व बताया।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम ने विद्यार्थियों के बीच ऐतिहासिक चेतना, स्थानीय एवं जनजातीय विरासत के प्रति सम्मान तथा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मध्य भारत की भूमिका को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण वातावरण निर्मित किया
