जयसिंहनगर / शहडोल : तालाब की फाइल में किसके हस्ताक्षर? स्वीकृति से भुगतान तक किस-किस अधिकारी ने लगाई मुहर—दस्तावेज खोलेंगे राज!” , कागजों में तालाब, भुगतान की कहानी में कौन-कौन शामिल? अब जांच के घेरे में पूरी प्रक्रिया
तालाब की फाइल में किसके हस्ताक्षर? स्वीकृति से भुगतान तक किस-किस अधिकारी ने लगाई मुहर—दस्तावेज खोलेंगे राज!” ,
कागजों में तालाब, भुगतान की कहानी में कौन-कौन शामिल? अब जांच के घेरे में पूरी प्रक्रिया
शहडोल/जयसिंहनगर। तालाब की फाइल खुली तो भ्रष्टाचार की परतें भी खुलती चली गईं। मीना के नाम पर स्वीकृत लघु तालाब की कहानी अब सिर्फ स्वीकृति तक सीमित नहीं, बल्कि कागजों पर दर्ज काम, मस्टर रोल और भुगतान तक पहुंच गई है। सवाल बड़ा है—जब मौके पर काम का सच कुछ और है तो सरकारी रिकॉर्ड में किसने किस आधार पर पूरी कहानी को सही ठहरा दिया?
यह है मामला
ग्राम पंचायत बलौड़ी में मीना के नाम पर स्वीकृत लघु तालाब को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ तत्कालीन सचिव ओमप्रकाश द्विवेदी तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामले में तत्कालीन एपीओ द्वारा की गई जांच के बावजूद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने से अब पूरी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। सवाल यह भी है कि यदि योजना का लाभ वास्तविक रूप से हितग्राही को मिला ही नहीं, तो स्वीकृति से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया किसके भरोसे पूरी कर दी गई?
मस्टर रोल से लेकर भुगतान तक खंगालने की जरूरत
मामले में यदि निष्पक्ष जांच होती है तो सबसे पहले उस लघु तालाब से जुड़े प्रशासकीय स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, मस्टर रोल, मजदूरी भुगतान, सामग्री भुगतान, स्थल निरीक्षण एवं कार्य पूर्णता संबंधी दस्तावेजों को सामने लाना होगा। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जिस स्थान पर तालाब स्वीकृत बताया गया, वहां वास्तव में कितना काम हुआ और मौके पर उसकी स्थिति क्या है?
जांच हुई तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिकायत के बाद मामले की जांच तत्कालीन एपीओ मनोज मिश्रा द्वारा किए जाने की बात सामने आई, लेकिन इसके बाद जिम्मेदारी तय करने की दिशा में क्या कदम उठाए गए? यदि जांच में कोई अनियमितता सामने आई थी तो संबंधितों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि अनियमितता नहीं मिली थी तो शिकायत का निराकरण किस आधार पर किया गया?
अब निगरानी की जद में आएंगे जिम्मेदार अधिकारी भी?
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी योजना में यदि कागजों पर काम पूरा दिखाकर राशि का भुगतान किया गया है तो केवल संबंधित पंचायत कर्मचारी ही नहीं, बल्कि सत्यापन और भुगतान प्रक्रिया से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। आखिर किसी भी योजना का काम बिना स्थल सत्यापन और दस्तावेजी प्रक्रिया के कैसे पूर्ण माना गया?
सबसे बड़ा सवाल—तालाब गया कहां?
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अब पंचायत के रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान जरूरी है। यदि दस्तावेजों में तालाब मौजूद है तो जमीन पर उसकी मौजूदगी कितनी है? कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी राशि निकाली गई और वास्तव में कितना काम हुआ—इन सवालों के जवाब सामने आते ही पूरे मामले की तस्वीर साफ हो सकती है।
अब देखना यह है कि संबंधित विभाग पुराने मामले का हवाला देकर फाइल को फिर दबा देता है या दस्तावेजों की नए सिरे से जांच कर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करता है।
