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शहडोल : केंद्रा अध्यक्ष मने शासकीय राशि को हजम करने वाला भूखा भेड़िया , सजक व सबल एवं सशक्त प्रशासन का एक और नमूना

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केंद्रा अध्यक्ष मने शासकीय राशि को हजम करने वाला भूखा भेड़िया ,

सजक व सबल एवं सशक्त प्रशासन का एक और नमूना

शहडोल (संजय गर्ग) । विगत समय पूर्व हमने आपको केंद्रा अध्यक्ष व उनकी नियुक्ति पर लेकर बड़ा खुलासा किया था।
जिस पर लगातार पत्राचार के बावजूद भी मामले में खुलासा तो होता है किंतु कार्यवाही नहीं होती जो कि यह बताता है कि हमारा प्रशासन कितना सशक्त और मजबूत है।
जो कि समय-समय पर इस कथित भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का काम करता है। किंतु हमने भी यह सोच कर रखा है कि चाहे जो हो जाए कथित तौर पर शिक्षा जगत में फैले एक-एक भ्रष्टाचार को चुन – चुन कर अपने खबरों के माध्यम से जनता के सामने लाएंगे और मामले में पारदर्शिता लाने का पूर्ण प्रयास किया जाएगा।
फिलहाल आज का हमारा विषय केंद्र अध्यक्षों के द्वारा परीक्षा केंद्र के अंदर कार्य में लगे कर्मचारियों के आर्थिक शोषण का है।
ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि जानकार सूत्रों के अनुसार केंद्रा अध्यक्ष द्वारा परीक्षा में कार्य में लगे कर्मचारियों को बिल में हस्ताक्षर कराकर पूरी राशि का भुगतान नहीं किया गया। जो की बिलों का आधा भुगतान करके केंद्रा अध्यक्ष रफू चक्कर हो गए। दरअसल माध्यमिक शिक्षा मंडल के द्वारा परीक्षा केदो में नियुक्त केंद्रा अध्यक्षों को प्रति छात्र के हिसाब से जो राशि प्रदान की जाती है साथ ही कार्य में लगे सभी कर्मचारियों को तिथि के हिसाब से राशि जारी की जाती है। प्राय यह देखा जाता है कि जिस भी परीक्षा केंद्रो में केंद्रा अध्यक्ष जाता है उसे केंद्र में 80% व्यवस्था चाहे वह पानी की हो या साफ सफाई की या फिर फाइल फोटोकॉपी कागज आदि सभी व्यवस्था विद्यालय के द्वारा ही की जाती है। जबकि इन सब की राशि माध्यमिक शिक्षा मंडल के द्वारा प्रदान की जाती है इसके बावजूद भी कुछ ऐसे केंद्र अध्यक्ष हैं जो कर्मचारी के पैसे काट लेते हैं और परीक्षा केंद्र में कार्यरत कर्मचारियों को पूरा पैसे का भुगतान नहीं किया जाता है और इतना ही नहीं थाने से प्रश्न पत्र एवं मूल्यांकन उत्तर पुस्तिका थाने तक पहुंचने वाले कर्मचारी तक का पैसा केंद्रा अध्यक्षों ने डकार दिया है।
जो कि इनका कैसे तौर पर भ्रष्टाचार करने का एक स्पष्ट नमूना है।
कहते हैं कि जब किसी पेड़ की जड़ मजबूत नहीं रहती तो वह मजबूती के साथ धरती पर नहीं टिकता है।
ऐसा ही कुछ हल हमारे शिक्षा जगत का है जहां पर कथित तौर पर हुए केंद्रा अध्यक्षों की नियुक्ति पर घोटाला कहीं ना कहीं इस चीज को दर्शाता है की गांधी जी के फेर में केंद्रा अध्यक्षों कितनी बड़ी नियुक्ति होती है।
जिसकी रिकवरी केंद्रा अध्यक्ष कुछ इस प्रकार ही करते हैं। किसी ने सच्ची कहा है कि भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। तभी तो केंद्रा अध्यक्ष बनने के होड़ में चढ़ोतरी करके नियुक्त किए गए केंद्रा अध्यक्ष अपनी खाली जेब लेकर परीक्षा केंद्रों में जाते हैं। और किसी न किसी तरीके से ऊपर दिए गए गुप्त दान की रिकवरी नीचे से करते हैं।
पर सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रकार कर्मचारियों से श्रमदान लेने के बाद उनको उसे श्रम का भुगतान नहीं किया जाना कहां तक उचित है।????

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