शहडोल : पीड़ित ने खाकी पर लगाया घूसखोरी और राजीनामे के दबाव का आरोप जनसुनवाई में कलेक्टर से लगी न्याय की गुहार, कई हड्डियां टूटीं ,25 दिनों तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा रहा पीड़ित , नहीं बढ़ी बीएनएस की गंभीर धाराएं ,
पीड़ित ने खाकी पर लगाया घूसखोरी और राजीनामे के दबाव का आरोप जनसुनवाई में कलेक्टर से लगी न्याय की गुहार, कई हड्डियां टूटीं ,
25 दिनों तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा रहा पीड़ित
नहीं बढ़ी बीएनएस की गंभीर धाराएं ,
शहडोल। कानून की सरपरस्ती में खोड़री के दबंग सचिव का गांधीवादी कनेक्शन अब खुलकर सामने आने का आरोप लगाया जा रहा है। मामला जैतपुर थाना क्षेत्र के ग्राम रसमोहनी का है, जहां 25 जुलाई को पंचायत सचिव और उसके बेटे सहित अन्य लोगों पर एक परिवार के साथ मारपीट कर गंभीर रूप से घायल करने के आरोप लगे थे। घटना के बाद घायल सतेंद्र सिंह बरगाही को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वह करीब 25 दिनों तक उपचाररत रहा।
पीड़ित परिवार का कहना है कि मारपीट में उसके हाथ और पैर की हड्डियां टूट गईं और गंभीर चोट के चलते ऑपरेशन तक कराना पड़ा। इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई को लेकर अब सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि मामले में दर्ज धाराओं में गंभीर चोट से संबंधित प्रावधान नहीं जोड़े गए, जबकि पीड़ित पक्ष द्वारा मेडिकल दस्तावेज पुलिस के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का दावा किया जा रहा है।
जनसुनवाई में पहुंचा पीड़ित, कलेक्टर से लगाई न्याय की गुहार
लंबे उपचार के बाद भी जब पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हुआ तो पीड़ित परिवार ने अब प्रशासन के दरवाजे पर दस्तक दी है। जनसुनवाई में पहुंचकर पीड़ित ने कलेक्टर के समक्ष पूरे घटनाक्रम की शिकायत रखते हुए निष्पक्ष जांच और आरोपियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि घटना के बाद से ही उसे न्याय के लिए थाने से लेकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय तक चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। परिवार का दावा है कि पुलिस द्वारा मामले को गंभीरता से लेने के बजाय लगातार समझौता और राजीनामा करने का दबाव बनाया गया।
25 दिन अस्पताल में भर्ती, फिर भी गंभीर धाराओं पर सवाल
पीड़ित पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए मेडिकल दस्तावेजों के अनुसार सतेंद्र सिंह के हाथ की और पैर की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ तथा उपचार के दौरान ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ी। गंभीर चोट के बावजूद एफआईआर में लगाई गई धाराओं को लेकर पीड़ित परिवार सवाल उठा रहा है।
परिवार का सीधा सवाल है कि यदि मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोट और फ्रैक्चर की पुष्टि हुई है तो जांच के दौरान चोट की प्रकृति के अनुरूप धाराओं की समीक्षा क्यों नहीं की गई?
112 की मौजूदगी के बावजूद मदद नहीं मिलने का आरोप
पीड़ित परिवार ने घटना के बाद पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। परिवार के अनुसार घायल अवस्था में जब वे जैतपुर थाने पहुंचे, तब थाना परिसर के आसपास पुलिस वाहन मौजूद था, लेकिन तत्काल सहायता नहीं मिली।
पीड़ित पक्ष का दावा है कि काफी देर तक मदद नहीं मिलने पर उसने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 पर शिकायत की, जिसके बाद पुलिस हरकत में आई।
परिवार का यह भी आरोप है कि घायल अवस्था में वृद्ध सतेंद्र सिंह को थाने के बाहर काफी देर तक इंतजार करना पड़ा। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने आना शेष है।
‘हम तुम्हारे नौकर नहीं हैं’—पुलिस पर संवेदनहीनता का आरोप
पीड़ित परिवार का कहना है कि अस्पताल से उपचार के बाद जब वह दोबारा थाने पहुंचा तो पुलिसकर्मियों के व्यवहार से उसे और निराशा हुई। परिवार का आरोप है कि पुलिस स्टाफ ने कथित तौर पर यह तक कह दिया कि “हम तुम्हारे नौकर नहीं हैं।”
यदि पीड़ित परिवार के आरोप सही हैं तो यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि गंभीर चोट से जूझ रहे शिकायतकर्ता के साथ पुलिस का व्यवहार कैसा होना चाहिए और क्या उसे अपनी शिकायत की जांच के लिए बार-बार थाने के चक्कर लगाने पड़ना चाहिए?
राजीनामे के दबाव का दावा, ऑडियो रिकॉर्डिंग का भी हवाला
मामले में सबसे गंभीर आरोप पुलिस द्वारा कथित रूप से राजीनामा कराने के दबाव का है। पीड़ित परिवार का दावा है कि उनके पास पुलिसकर्मियों से हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है, जिसमें कथित तौर पर मामले को खत्म करने और समझौता करने के लिए दबाव बनाए जाने की बात सामने आती है।
यदि ऐसी रिकॉर्डिंग वास्तव में मौजूद है तो उसकी तकनीकी जांच और निष्पक्ष सत्यापन के बाद ही उसकी प्रमाणिकता स्पष्ट हो सकती है। ऐसे में पीड़ित परिवार ने वरिष्ठ अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर भी उठे सवाल
पीड़ित परिवार का आरोप है कि घटना को एक माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद नामजद आरोपियों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। परिवार का दावा है कि आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और उन्हें किसी कार्रवाई का भय नहीं है।
पीड़ित का कहना है कि यदि सामान्य व्यक्ति पर गंभीर मारपीट के आरोप लगें तो पुलिस तत्काल कार्रवाई करती है, लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति के मामले में कार्रवाई की रफ्तार अलग क्यों दिखाई दे रही है?
अब कलेक्टर की चौखट पर पहुंचा मामला
थाना स्तर पर न्याय नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए पीड़ित परिवार अब प्रशासन से उम्मीद लगाए बैठा है। जनसुनवाई में शिकायत के बाद निगाहें अब जिला प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर हैं।
पीड़ित पक्ष की मांग है कि मेडिकल रिपोर्ट, उपचार संबंधी दस्तावेज, घटनास्थल की जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पुलिस द्वारा की गई अब तक की कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। साथ ही यदि पुलिसकर्मियों द्वारा समझौते का दबाव बनाए जाने की पुष्टि होती है तो संबंधितों के विरुद्ध भी कार्रवाई की जाए।
सवाल जो अब जवाब मांग रहे हैं
◆ गंभीर फ्रैक्चर और ऑपरेशन के बावजूद धाराओं की समीक्षा क्यों नहीं हुई?
◆ मेडिकल दस्तावेज पुलिस के पास पहुंचने के बाद जांच में क्या बदलाव किया गया?
◆ आरोपियों के विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई हुई?
◆ क्या पीड़ित परिवार पर राजीनामे का दबाव बनाया गया?
◆ कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग की निष्पक्ष जांच कब होगी?
◆ जनसुनवाई में शिकायत के बाद जिला प्रशासन मामले की जांच किस अधिकारी से कराएगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पीड़ित के आरोपों में सच्चाई है तो कानून की धाराएं चोट की गंभीरता के अनुरूप क्यों नहीं बढ़ीं और यदि आरोप गलत हैं तो पुलिस निष्पक्ष जांच के जरिए इन सवालों का जवाब कब देगी?

