S.K. Paswan
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शहडोल : गर्व से कहो हम भ्रष्टाचारी : प्रशासन ने कर ली है पूरी तैयारी , तो संगठित भ्रष्टाचार के कुचक्र में फंसा है अनुसूचित आदिवासी अंचल शहडोल ……………!

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गर्व से कहो हम भ्रष्टाचारी : प्रशासन ने कर ली है पूरी तैयारी , तो संगठित भ्रष्टाचार के कुचक्र में फंसा है अनुसूचित आदिवासी अंचल शहडोल ……………!

*यह कहते हैं कलेक्टर*

शहडोल (संजय गर्ग) । बीते कुछ दिनों में शहडोल संभाग के विभागों में जो भी हुआ या जो हो रहा है वह सामान्य नहीं। बल्कि एक सोची समझी राजनीति का हिस्सा है। लगातार शिक्षा विभाग एवं अन्य विभागों में बिलों का भ्रष्टाचार उजागर हुआ। जिसने जिले से लेकर प्रदेश और देश में विशेष अनुसूचित आदिवासी अंचल की ख्याति को भ्रष्टाचार में बढ़ा दी। मामला इतना उजागर हुआ कि स्वयं जिला प्रशासन को बचाव करने मैदान में उतरना पड़ा । लगभग तेरह दिन लंबा ड्रामा प्रशासन द्वारा चलाया गया जिसमें जिला शिक्षा अधिकारी को पेंट घोटाले मामले में नोटिस जारी की गई जाहिर सी बात है कि ऐसे ही नोटिस की बौछार उन विभागों में भी की गई होगी जहां से बिल निकाल कर सामने आए जैसे जिला पंचायत सवाल यह है कि जारी नोटिस एक कार्यवाही का झुनझुना जो शहडोल जिले के पत्रकारों को पकड़ा दिया गया है। कारण बताओं नोटिस कि आड़ में डैमेज कंट्रोल का ब्रह्मास्त्र जो की कहीं ना कहीं भ्रष्टाचारियों को संरक्षित करने के उद्देश्य से चलाया गया जिससे ऊपर वाले संतुष्ट हो गए और नीचे वाले कुछ बोलेंगे नहीं क्योंकि उनके पास हिम्मत और जमीर दोनों नहीं है।
पर सवाल यह उठता है कि क्या हम इन सब घटनाओं को देख रहे हैं जो हमारे अस -पास हो रही है तो क्या इससे यह मान ले की संगठित भ्रष्टाचार के कुचक्र में आदिवासी संभाग फंसा हुआ है और एक नारा हम लगाने लगे!… की गर्व से कहो हम भ्रष्टाचारी है।
हालांकि इन मामलों को लेकर एक सवाल मन में आता है वह यह है कि क्या भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार कहना गलत है । और गलत को गलत कहने में यदि आप नहीं झिझक कर रहे हो तो । आपके मन में खोट है। ऐसा मानिए आज का दौर ऐसा ही है।

एआई का हवाला तो क्या ???बच गया भ्रष्टाचार करने वाला
बीते दिनों शहडोल जिले में शिक्षा विभाग और जिला पंचायत में जिस प्रकार पेंट घोटाले ड्राई फ्रूट्स घोटाले सामने आए जिसे प्रशासन की नींव को हिलाने का प्रयास तो किया लेकिन। यह प्रयास एक ही बार में सफल हो गया जब इस पूरे मामले में एआई की एंट्री हो गई।
एआई मतलब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अर्थात वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया एक ऐसा उपकरण जो की हू ब हू इंसानों के तरीके से काम करता है और पलक झपकते ही वह सारे जवाब को बताता है जिसे आपको बताने में गुणा भाग करने की जरूरत पड़ेगी। यह वैज्ञानिक तकनीक 21वीं सदी के लिए जितनी लाभदायक है। उतने ही हानिकारक भी इसका प्रमाण शहडोल जिले में देखने को मिल रहा है।

प्रशासनिक जांच में ऐसा दावा

दरअसल वायरल बिलो में प्रशासन ने अपने स्तर से जांच की और एक अखबार नवदुनिया प्रतिनिधि शहडोल में शहडोल के कलेक्टर ने आधिकारिक तौर पर यह बयान दे डाला कि एआई का जमाना है पुताई मरम्मत और ड्राई फ्रूट्स के बिल है नकली। आधिकारिक बयान से कहीं ना कहीं प्रशासन के द्वारा निष्पक्ष जैसे शब्दों पर कीचड़ उछालना लग रहा है।

एआई के हवाले पर ऐसे खड़े हैं सवाल
पेट घोटाले एवं ग्राम पंचायत भदवाही में ड्राई फ्रूट्स घोटाले में ए आई का जन्म कई सवालों को भी जन्म दे रहा है। जैसे की . यदि वायरल बिल फर्जी हैं, तो प्रशासन ने अब तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं करवाई?
. यदि ये ए आई या अन्य तकनीक से जनरेटेड हैं, तो वे शासकीय प्रक्रिया में दस्तावेजों के रूप में दाखिल कैसे हो गए?
. क्या जांच के नाम पर वास्तविक भुगतान के रिकॉर्ड से वायरल बिलों को प्रतिस्थापित किया जा रहा है?
हालांकि यह सवाल चीख चीख कर यह कह रहे हैं कि मामला कुछ और है लेकिन कहीं ना कहीं इन सवालों का जवाब प्रशासन के पास नहीं है यह तो स्पष्ट है।

क्या हम स्वतंत्र हैं?????
यह तो एक नमूना है जो प्रशासन ने दिखाई और यह आज के तौर पर सिर्फ शहडोल में ही नहीं देश की भी वर्तमान की परिस्थितियों का प्रतिबिंब है जिसका अंश भाग शहडोल में देखने को मिल रहा है।
और भी कई मुद्दे होते दफन
इतना ही नहीं आदिवासी अंचल शहडोल में केवल भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि जल सोत्रो में अतिक्रमण का भी बड़ा मुद्दा इसी प्रकार धीरे-धीरे फाइलों में दफन होता जा रहा है।
देश में न्याय पाना कितना कठिन है । ये किरण टॉकीज का बावड़ी का मुद्दा उसका जीवंत उदाहरण है। जहां 100 दोनों से क्रमिक अनशन पर बैठे लोगों को ना तो प्रशासन सुन रहा है और ना ही शासन सुन रहा है।
हालांकि यह अतिक्रमण का मुद्दा स्पष्ट रूप से सत्ता के दबाव का उदाहरण है। तभी तो जांच होने के बाद भी उक्त भूमि को अतिक्रमित मुक्त नहीं कराया जा रहा।

यह पूरा घटनाक्रम जो शहडोल में चल रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि हम अंग्रेजों से तो आजाद हो गए लेकिन। वर्तमान में हमारी आजादी प्रशासन नाम के पिंजरे में कैद है। जिसकी चाभी सत्ता के हुक्मरानों के पास है

आप बोलिए लेकिन आवाज नहीं आनी चाहिए , आप सुनिए लेकिन कान बंद होने चाहिए आप देखिए वही जो आपको दिखाया जा रहा है, आप लिखिए लेकिन उसमें भी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार………..
बरहाल सत्य की तलाश जारी है और न्याय कर पाने में सरकारी तंत्र फेल है।

इनका कहना
जो बिल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं उनमें कहीं ना कहीं तकनीकी रूप से छेड़छाड़ की गई है हमने जांच कराई है।

केदार सिंह (कलेक्टर) शहडोल (म. प्र) ।

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