तो कैसा आजाद भारत का सपना हमने देखा था….. लोकतंत्र होते हुए भी भोग तंत्र का विस्तार??????
शहडोल (संजय गर्ग)। स्वतंत्र भारत का सपना आंखों में सजे हुए जिस प्रकार देश के वीर और महान क्रांतिकारियों ने देखा और उसे सकार करने के लिए भारत को आजाद करने के लिए अपना बलिदान दिया । इसके बाद स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत का सपना कुछ हद तक सकार हुआ। लेकिन सोचना अति आवश्यक है कि 21वीं सदी में भारत डॉ ए.पी.जे .अब्दुल कलाम के इंडिया विजन 2020 में आज कितने प्रतिशत तक सफल और सक्षम हुआ है।
सवाल यह है कि आज हमारे भारत देश में किस प्रकार लोग स्वतंत्रता को महसूस करते हैं क्या आजादी के 79 वर्ष पूर्ण होने पर हर स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराकर और बूंदी खाकर हम अपने आप को स्वतंत्र मानते हैं। यह किस हद तक सही है इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा क्योंकि सभी समझदार हैं और सभी बुद्धजीवी ।
हमारा भारत देश सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहां लोकतंत्र है जहां लोगों को बोलने की स्वतंत्रता है अपनी विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता है।
हमारे संवैधानिक अधिकार जो हमें मिले हुए हैं। जैसे – समानता का अधिकार , स्वतंत्रता का अधिकार , शोषण के विरुद्ध अधिकार , धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार , सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार , साथ ही संवैधानिक उपचारों का अधिकार ।
लेकिन क्या वर्तमान आजाद भारत में इनअधिकारों का लोग सदुपयोग कर रहे हैं या देश के आम नागरिक इन अधिकारों का इस्तेमाल कर पा रहे हैं इस पर प्रश्न चिन्ह है।
ज्यादा दूर न जाए अपने क्षेत्र यानी अपने शहडोल संभाग की ही बात करें तो बीते दिनों किस प्रकार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले प्रकाश में आए लेकिन दुर्भाग्य व सभी एआई जेनरेटेड निकले। जो यह दर्शाता है कि सत्ता का सुरूर और अधिकारियों का गुरुर आजाद भारत को किस ओर ले जा रहा है*और यह सिर्फ संभाग ही नहीं बाकी पूरे देश में जो चल रहा है उसका एक प्रतिबिंब है।
आजाद भारत का कड़वा सच दब रही विपक्ष की आवाज
हाल ही में देश में विपक्ष ने मतदान के विषय को उठाया है कि किस प्रकार मतदाताओं के मताधिकार का दुरुपयोग होता है। कमाल की बात तो यह है कि इतने बड़े मुद्दे को कलमकार ने सत्ताधारियों के गांधी जी के बोझ के तले दबा दिया। तो ऐसी आजादी किस काम की जहां पर लोकतंत्र होते हुए भी भोग तंत्र का विस्तार हो रहा हो।
देश की शिक्षा नीति पर भी चोट
युवाओं का भविष्य शिक्षा पर टिका हुआ है लेकिन जिस प्रकार वर्तमान आजाद भारत में शिक्षा की कमर तोड़ी गई है वह दर्शाता है कि देश के वर्तमान हालात देश की आने वाली युगल भविष्य और भावी पीढ़ी के लिए अति दुखदाई है। उदाहरण के लिए नीट और एसएससी जैसे कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स जहां साल भर युवा अपना पूरा फोकस नित और एसएससी जैसे अन्य कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स पर अपना 100% देते हैं और फिर एक ही झटके में कहीं पेपर लीक होता है तो कहीं एग्जाम रद्द।
और फिर विरोध करने पर गुरु से लेकर शिष्य तक मिलती है तो सिर्फ सत्ता की पुलिस के द्वारा परोसी गई लाठियां।………
तो क्या ऐसा है आजाद भारत यह सवाल इन घटनाओं से बार-बार जहन में घूमता है।
सत्ता की बिसात बना धर्म का प्रचार
संवैधानिक अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है लेकिन देश में जब राजनीति का अखाड़ा धर्म की माटी से तैयार हो तो सोचिए उसे आजाद देश का क्या हाल है।
मंदिर मस्जिद के नाम पर देश की आबो हवा दूषित होती है। लेकिन आप बोल नहीं सकते आप बोलेंगे तो आप गुनहगार कहलाएंगे।
तो सवाल यह है कि क्या हमारा सोने की चिड़िया कहलाए जाने वाला देश जो आज सशक्त और परिपूर्ण है उसमें धर्म के नाम पर और जाति के नाम पर क्या भेदभाव होना चाहिए इस पर भी मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा क्योंकि आप सभी बुद्धिजीवी हैं क्यों देश में सर्वधर्म समभाव की भावना नहीं हो सकती। यह भी बड़ा सवाल है।
सत्ताधारी और अधिकारियों का तालमेल का ऐसा नमूना
जब सत्ता का सुरूर और अधिकारियों का गुरूर एक हो जाए तो फिर हालात ऐसे हो जाते हैं कि जैसा कि इन दिनों पौराणिक बावड़ी को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए लगभग 100 दिनों से भी ऊपर बीत चुके हैं लेकिन शुरुर और गुरूर का मिश्रण ऐसा है कि न्याय पाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
स्पष्ट तौर पर सत्ता का दबाव अधिकारियों पर दिखता है।
तो सवाल यह है कि जिस लोकतांत्रिक और आजाद भारत का सपना हमारे महान क्रांतिकारियों ने देखा था समय बीतते बीतते आज वह सपना कितना सकार हुआ और हम दुनिया का सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते हैं जहां हमारे देश में ही हमारे शहर में ही हमें न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।
लेकिन फिर भी हम आजादी का उत्सव मनाते।
बढ़ती बेरोजगारी और टैक्स की मार
एक ओर जहां लोगों को पढ़े लिखे होने के बावजूद भी नौकरियां नहीं मिल रही हैं तो वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी पार्टी केंद्र में बैठकर टैक्स पर टैक्स लग रही है पर सवाल यह है कि जब आय का साधन नहीं तो टैक्स कहां से भरेगा आम आदमी।
अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि हालात जैसे दिख रहे हैं वैसे नहीं है यह जो दिखाया जा रहा है उसे देखने का प्रयास करें लेकिन उससे हटकर भी देखें और सोचें की क्या हम सचमुच में आजाद हैं।
